Thursday, 31 December 2020

जब रावण मर रहा था तब श्री रामचंद्र भगवान ने लक्ष्मण जी से कहा--

जब रावण मर रहा था, तब भगवान् श्री राम ने लक्ष्मण जी से कहा --:-

           एक कथा आती है कि जब रावण मरा था, तब भगवान् श्री राम ने लक्ष्मण जी से कहा -- आज एक बड़ा विद्वान एक बड़ा नीतिज्ञ जिसने वेदों पर भाष्य आदि लिखे हैं वह जा रहा है ।

                      अतः उससे कोई लाभ लेना चाहो तो ले लो ।' लक्ष्मण जी जाकर रावण के सिर की तरफ खड़े हो गए और पूछा कि तुम्हारे जीवन का क्या सार है--यह बताओ । लक्ष्मण जी सिर की तरफ खड़े थे, इस कारण रावण बोला नहीं ।

 फिर भगवान् श्री राम के कहने से लक्ष्मण जी रावण के पैरों की तरफ जाकर खड़े हो गए तब रावण बोला--'तपस्वी, एक बात है कि जो काम करना है उसे जल्दी ही कर लेना चाहिए ।मेरा विचार था कि चंद्रमा को निष्कलंक कर दूं और चंद्रमा रोजाना पृथ्वी पर उदय हो  । अमृत लाकर समुद्र का जल मीठा कर दूं, स्वर्ग तक सीधी लगा दूं ,जिससे वहां कभी भी आ जा सके । अग्नि का धुआं मिटा दूं ऐसा बिचारा था, परंतु कर नहीं सका इस वास्ते जो काम करना हो शीघ्र  कर लेना चाहिए  ।

                                                अतः प्रत्येक अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति जो भी आपको प्राप्त है उसका सदुपयोग करोगे तो वह आपके कल्याण में सहायक हो जाएगी ।
इस बात को हमेशा सबको याद रखनी चाहिए, मेरे समझ से।

जय श्री राम, जय श्री राम, जय श्री राम ।।।

#अनमोल जीवन #वेद की जानकारी #धार्मिक और आध्यात्मिक #सच्चा ज्ञान #मनोरंजन #सच्चा ज्ञान 

Tuesday, 29 December 2020

सबसे ऊंची अवस्था, धर्म की ज्योति-

धर्म की ज्योति'' सबसे  ऊंची अवस्था -

        मनुष्य धार्मिक बने और अपने- अपने धर्म को पहचाने ।संप्रदाय भले ही अनेक हो धर्म एक ही होता है, और धर्मवान, मनुष्य सदाचारी और सिलवान बन सकता है  ।


सबसे ऊंची अवस्था-  सबसे ऊंची अवस्था यह है कि मनुष्य सुख - दु:ख, हर्ष, सुख, जय पराजय, हानि, लाभ में एक जैसा ही रहे ना खुशी के समय फुले, नाराज किस में उदासी लाए यही द्वंदातीत  अवस्था है यही मोक्ष है यही सबसे ऊंची अवस्था  है  ।

#अनमोल जीवन #सच्चा ज्ञान #मनोरंजन #धर्म #डेली सुविचार #सुखदुख 

Monday, 28 December 2020

बिन सत्संग विवेक न होई, संगत का असर--

बिनु सत्संग विवेक न होई,,, संगत का असर ---

         बिन सत्संग विवेक न होई, ""! विवेक ही बुद्धि की वह स्थिति हैजहां उसको धीरे-धीरे संसार का वास्तविक ज्ञान प्राप्त होता है और एक स्थिति ऐसी आती है जब बुद्धि थक कर बैठ जाती है और कहती है   "नेति -नेति  " । इसके बाद एक स्टेज और रह जाती है वह है  - अहंकार का नाश होना  ।


आप सब ने देखा होगा कि जब हम मंदिर जाते हैं तो वहां भगवान के चरणों में हम नारियल तोड़ते हैं नारियल के ऊपर का खोल बड़ा ही कठोर होता है और उसको तोड़ने में ताकत लगती है  । परंतु जब वह टूट जाए तो उसके अंदर मीठा फल प्राप्त होता है । सच पूछिए तो यह अहंकार तोड़ने का ही एक स्वरूप है एक उपमा है, किंतु गुरु जब यह कार्य संपन्न करता है तो साधक बिलबिला जाता है  । यह बड़ा कष्ट कर होता है । परंतु इसके बिना साधा को ईश्वर प्राप्ति का मीठा फल प्राप्त नहीं हो सकता ।
 
#अनमोल जीवन #सच्चा ज्ञान #मनोरंजन #वेद की जानकारी #धार्मिक और अध्यात्मिक #Mukeshsolution 

Friday, 25 December 2020

मनुष्य अपना शत्रु स्वयं और अपना मित्र स्वयं है, ना कोई शत्रु न कोई मित्र -

मनुष्य आप ही अपना मित्र और आप ही अपना शत्रु है--

मनुष्य अपना मित्र और आप ही अपना शत्रु है और कोई ना तो शत्रु है ना मित्र है,
                             


                                     परिस्थिति का यदि सदुपयोग  करें, तो वही परिस्थिति उद्धार करने वाली हो जाती है  ।
उदाहरण के लिए ध्रुव जी का दृष्टांत है,। ध्रुव जी से द्रोह रखने वाली मां सुरुचि प्यार करने वाली मां सुनीति और उदासीन नाराज बाबा तीनों ही कल्याण में से सहायक बने । अतः जो परिस्थिति प्राप्त हो उसका पूर्ण सदुपयोग करो यह मत सोचो कि अनुकूल परिस्थिति आएगी तब भजन करेंगे, वैसा कुछ हो जाए तब भजन करेंगे, छोरा  (लड़का) काम संभाल ले फिर भजन करेंगे, फिर नहीं होगा, किसी का हुआ नहीं  ।
 
कल को किसने देखा है ।

                                 अतः प्रत्येक अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति जो भी आपको प्राप्त है, उसका सदुपयोग करोगे तो वह आपके कल्याण में सहायक हो जायेगी ।

#मनोरंजन #अनमोल जीवन #सच्चा ज्ञान #Daily सुविचार #आध्यात्मिक_ज्ञान #वेद पुराण 

Wednesday, 23 December 2020

जीवन मंत्र, जीवन का सत्य--

जीवन का सत्य, अनमोल जीवन--

मनुष्य केवल अपने अनुभव ,(आप बीती) का आदर करें तो उसका काम बन जाए ।

अनुभव क्या है ?

अपने पास जो चीज मिली है वह सब अपनी नहीं है ! यह खास बात है !जो मिली हुई होती है वह अपनी नहीं होती है ! शरीर, घन ,जमीन, वैभव संपत्ति जो कुछ मिला है वह अपना नहीं है इस बात पर विचार करें ! ऐसा मानने से ममता मिट जाती है ममता ही नहीं अहंकार भी मिट जाती है ।

जीवनजीवन का सत्य, अनमोल जीवन--

मनुष्य केवल अपने अनुभव ,(आप बीती) का आदर करें तो उसका काम बन जाए ।



अनुभव क्या है ?

अपने पास जो चीज मिली है वह सब अपनी नहीं है ! यह खास बात है !जो मिली हुई होती है वह अपनी नहीं होती है ! शरीर, घन ,जमीन, वैभव संपत्ति जो कुछ मिला है वह अपना नहीं है इस बात पर विचार करें ! ऐसा मानने से ममता मिट जाती है ममता ही नहीं अहंकार भी मिट जाती है ।

जीवन भर याद रखने अमूल्य बातें ।

Tuesday, 22 December 2020

धार्मिक परिवार वाली लड़की को शादी होने के बाद मिला इसके विपरीत लड़का परिवार-_आगे पढ़े जाने,

शादी होने के बाद मिला विपरीत परिवार, आगे पढ़े क्या हुआ —

एक गांव में एक धार्मिक परिवार की लड़की दूसरे गांव में ब्याही गई थी दोनों परिवार बहुत संपन्न थे परंतु लड़की के घर में धार्मिक वातावरण था और लड़के के घर में इसके विपरीत

शादी के बहुत दिन बाद एक गांव वाला लड़की के ससुराल वाले गांव को जा रहा था उसने लड़की के पिता को कहा कि भैया मैं वहां जा रहा हूं अगर कुछ समाचार अपनी पुत्री को भेजना हो तो बता दो लड़की के पिता ने कहा कि हम सब यहां राजी खुशी हैं आप लड़की से भी उसकी राजी खुशी के समाचार ले आना अपना कार्य कर वह लड़की से मिलने गया और पूछा कि बेटी तुम्हारा क्या हाल है तुम्हारे पिता ने तुम्हारे कुशल क्षेम पूछी है लड़की बोली की पिताजी से कहना कि मैं बहुत सूखी हूं , यहां सब कुछ अच्छा है, ।

लेकिन खाना बासी ही मिलता है लड़की के ससुर ने इस बात को सुन लिया जब गांव वाला चला गया तब लड़की का ससुर बहुत नाराज हुआ और कहा कि तुम्हें तो यहां सुख ही सुख मिलता है तुम ही बताओ कि क्या मैं तुम्हें बासी खाना देता हूं तुमको तो सदैव ताजा खाना ही मिलता है तब तुमने बासी खाने की बात अपने गांव वाले से कैसे कही, बहू बोली की पिताजी मैंने सत्य अपने गांव वाले को कही है , ।

देखिए -अपने पहले जन्म में पुण्य कर्म किए थे उसका फल आपको आज मिल रहा है परंतु अभी आप ऐसा कोई पुण्य कर्म नहीं कर रहे हैं जिससे कि आपको आगे आने वाले जन्म में सुख मिले वह समझदार था बोला कि बेटी तुम ठीक कहती हो आज से मैं पुण्य कर्म क्या करूंगा

उस परिवार में धार्मिक परिवार से आने वाली बेटी ने फिर से उस उस परिवार को धर्म के रास्ते पर चलना सिखला ही दिया

Monday, 21 December 2020

दूसरों की निंदा मत करो --

दुसरों की निन्दा नहीं करनी चाहिए-



मनुष्य को पर निंदा से बचना चाहिए । मनुष्य को सबसे अधिक सुख दूसरे की बुराई करने में मिलता है । क्योंकि दूसरे की बुराई में जो आनंद आता है वह अन्य किसी बात में नहीं आता । लेकिन जब खुद किसी की बुराई करता है तो उसका चेहरा भी खुद के सामने आता है और जो कमजोरियां उस मनुष्य में होती है वह खुद में आ जाती है ।
इसीलिए मनुष्य को दूसरे की निंदा से सदैव बचना चाहिए
निंदा करनी और सुनना भी हानिकारक है । अतः जितना समय पर निंदा करने के दूसरे की तरफ जाता है उतना ध्यान खुद चिंतन करने में लगानी चाहिए और आध्यात्मिक सफलता मनुष्य के लिए यह भी बहुत ही जरूरी है ।

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Saturday, 19 December 2020

ब्रह्मभूत: प्रसन्नआत्मा न शोचति न कांक्षाति । सम: सर्वेषु भूतेषु मद,भक्तिं लभते पराम् ।।


आत्म सिद्ध मनुष्य सदा प्रसन्न रहता है । उसे भविष्य की चिंता नहीं सताती ।बड़े से बड़े कठिन संकट के समय में भी अशांति उसके पास नहीं पटकती , दुःख व विपत्ति में भी शांत और सुख व आनंद के समय में भी शांत -एकरस जीवन उसका चलता रहता है ।
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Thursday, 17 December 2020

भोजन का प्रभाव,अन्न मन

भोजन का प्रभाव,जैसा अन्न वैसा मन --

भोजन का प्रभाव : भोजन का मन से सम्बन्ध बताने हेतु आप वैज्ञानिकों की शोध के आधार पर कहते थे कि सात्विक भोजन करने से मन शांत बनता है और तामसी भोजन करने से मन चंचल बनता है तथा अपराधिक प्रवृत्ति को बढ़ाता है ।इसके कारण के रूप में उन्होंने कहा कि सात्विक भोजन से मनुष्य का जो खुन बनता है उससे उसके मस्तिष्क में एमीनो एसिड्स बनते हैं जो मन को शांत बनाते हैं । इसके विपरीत तामसी,या सामिष भोजन से जो खून में पदार्थ बनते हैं वह मन को चंचल बनाते हैं।

किसी ने सच कहा -- जैसा खाओगे अन्न वैसा बनेगा मन

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Thursday, 28 May 2020

हम आंख वाले होते हुए भी कभी ईश्वर को नहीं देख पाते?

किसी अंधे मनुष्य से किसी ने पूछा, --बाबा । तुम्हें कुछ दिखाई देता है ? वह बोले नहीं बाबा दिखाएं और तो कुछ नहीं देता, दिन में दो बार ईश्वर को अवश्य देख लेता हूं। वह बोला कैसे ? कहने लगे जब कोई मुझसे पूछता है , क्या तुम भोजन करोगे ?वह भोजन देता है, ठंडा पानी पिलाता है ,सिवाय ईश्वर के मुझे यह कौन पूछेगा ?
                                                           ऐसे पूछने वाले को मैं ईश्वर ही समझता हूं , क्योंकि ईश्वर सबको देता है सबको भोजन पहुंचाता है। उस पर से मैं तो अंघा हूं, वह तो मुझे ढूंढ कर ही मेरे पास आता है। परन्तु हम आंख वाले होते हुए भी कभी ईश्वर को नहीं देख पाते।

                                                                मुकेशकुमार

Thursday, 21 May 2020

सम्मान-

प्राय  सम्मान देने की ट्रेनिंग घर से ही लेनी चाहिए। अपसंस्कृति के बढ़ते प्रभाव के चलते घर में ही सम्मान का जबरदस्त चीरहरण हो रहा है। घर परिवार के सदस्यों में बड़े -छोटे का लिहाज यदि नहीं रह गया है, तो ऐसे परिवार में कलह अशांति तनाव बना रहेगा,गोस्वामी तुलसीदास स्पष्ट करते हैं कि जहां सुमति दी होती है वहां संपत्ति होती है और जहां कुमति वहां विपत्तियां डेरा जमाए रहती है ! यहां संपत्ति से मतलब सुख शांति है और कुमति का असर अशांति तनाव तथा कलह।
तनाव भरे परिवार माहौल में रहने वाला समाज में आदर पूर्ण सम्मान नहीं प्राप्त कर सकता है,क्योंकि अंदर बाहर के भाव में सामंजस्य नहीं है तो जीवन में द्वंद बना रहेगा पहले आत्मा तो परमात्मा का आशय है ही कि व्यक्ति में यदि आत्मीयता है तो पराए लोग भी उसे हृदय से सम्मान देंगे। 
अतः अपने परिवार को परिवार समझे परिवारिक माहौल में आनंदपूर्वक जीवन व्यतीत करें एक दूसरे को सम्मान दे और सम्मान ले।
                                                                धन्यवाद
                                                              मुकेश कुमार

Saturday, 2 May 2020

ज्ञानपथ के दस आलोक

१. ईश्वर तो एक शक्ति ( पावर ) है, ना उसका कोई नाम है न         रूप। जिसने जो नाम रख लिया वही ठीक है।
२. उसको प्राप्त करने के लिए गृहस्थी त्याग कर जंगल में            भटकने की आवश्यकता नहीं , वह घर में रहने पर भी            प्राप्त हो सकता है ।
३. अभी तुमने ईश्वर देखा ही नहीं,उसे प्राप्त करने के लिए            पहले  उससे मिलो जिसने ईश्वर को  देखा है ।
४. अपने जीवन में आंतरिक प्रसन्नता लाओ। यह बहुत बड़ा 
     ईश्वरीय गुण है।
५. ज्ञान में शांति है, वह तुम्हें बाहर से नहीं मिलेगी। ज्ञान अंतर       में है। उसके लिए आंतरिक साधन करने होंगे।
६. अधिक समय तुम संसार के कामों में लगाओ, थोड़ा समय       इधर दो, लेकिन इतने समय के लिए तो संसार को भूल           जाओ।
७. दो काम साधाक के लिए बहुत ही आवश्यक है-एक तो          परिश्रम से भोजन कमाना और दूसरा अपने मन को हर           समय काम में लगाए रखना।
८. ज्ञान अनंत है। यदि एक गुरु उसे पूरा ना कर सके तो दूसरे       गुरू से प्यार करना चाहिए।
९. दुनिया के सारे काम करो लेकिन सेवक बनकर, मालिक           बन कर नहीं ।
१०. संसार में मेहमान बन कर रहो । यहां की हर वस्तु किसी          और की समझो । मैं और मेरा छोड़कर तू और तेरा का             पाठ सीखो ।

Wednesday, 15 April 2020

करने में सावधानी, होने में प्रसंता

इसका अर्थ हुआ कि ईश्वर संपूर्ण प्राणियों को अपनी माया से भ्रमण कराते हुए सब प्राणियों के हृदय में स्थित हैं। तो प्रश्न उठता है कि सब कुछ ईश्वर ही कराते हैं क्या ?
तो अब इसका उत्तर सुनिए एक होता है 'करना' और एक होता है 'होना'तो करने में तो हम सबका अधिकार है परंतु होने में अधिकार नहीं।
एक तो हम करते हैं और एक होता है। तो कर्म तो हम करते हैं और फल होता है। करने में जो कृतित्व तो अभिमान रहता है वहीं आगाड़ी फल भोग में परिणत होता है।
अतः जीव जब तक कृतित्व अभिमान पूर्वक अपने मन के अनुसार कार्य करेगा तो उसका फल उसे भोगना पड़ेगा और दुख पाना पड़ेगा ।
इस वास्ते यह सोचना है कि हम जो करते हैं ईश्वर प्रेरणा से करते हैं गलत है। हम जैसा काम करते हैं, हमें उसके अनुसार फल भोगना पड़ेगा। या भगवान का विधान है कि ऐसा करोगे तो ऐसा फल होगा।
                          अत:करने में सदा सावधान रहें और जो होता है,उसमें प्रसन्न रहें कि सब हमारे प्रभु के विधान के अनुसार होता है।
                          

Tuesday, 7 April 2020

शांति कैसे मिले ?

अंहता- ममता बढ़ाकर अशांति आपकी स्वयं पैदा की हुई है।
जितनी अहंता- ममता अधिक होगी, उतनी अशांति अधिक होगी। और अहंता -ममता जहां त्याग किया कि तत्काल शांति मिली।