Sunday, 2 March 2025

ज्ञान की बातें व्यवहारिक धर्म

व्यवहारिक बातें और व्यवहारिक धर्म--


1, संत या सज्जनों की निंदा का पाप मनुष्य मारने के बराबर होता है,इसीलिए हरि भक्तों की ना तो निंदा करो और ना ही निरादर करो ?

२, भक्तों के लिए बहुत खाना अच्छा नहीं होता है इससे ह्रदय कठोर होता है, उसका तेज जाता रहता है, और इष्ट से दूर हो जाता है!

३,कम खाओ कम हों सोओ,इससे भजन में बड़ी सुविधा मिलती है और ऐसा मनुष्य साधन में जल्दी अग्रसर हो जाता है ।

४,धनीको और मालदारोको भजन का फल नहीं मिलता इसीलिए कि उनके तीन काम ही होते हैं पहला, अच्छे-अच्छे पदार्थ खाना दूसरा, बढ़िया कपड़ा पहनना और तीसरा, मुंह फाड़ फाड़ के बातें करना ऐसे लोग मरने के पश्चात भूखे और नंगे रखे जाते हैं !

५,ईश्वर से प्रेम करो उससे हर समय डरो ताकि पाप कर्म ना होने पाए । प्रेम से संबंध अच्छा होता है और वह कुकर्म से बचाता है।

#अनमोल जीवन #सच्चा ज्ञान #वेद की जानकारी #मनोरंजन 

उपासना

उपासना के दो साधन है
एक चिंतन और दूसरा ध्यान

Sunday, 19 February 2023

*पवित्र भाव*

पवित्र भाव

जिस भाव से पुजा की जाती है वैसा ही फल भी मिलता है! इसी प्रकार जो गुरु को मनुष्य समझकर मिलते है उन्हे मनुष्य जैसा लाभ मिलता है जो महापुरुष समझकर मिलते है उसे महापुरुष जैसा लाभ मिलता है! हम मंदिर में भगवान की मूर्ति समझकर पूजा करते है तो उसे वैसा ही लाभ होता है और साक्षात परमात्मा समझकर पूजा करते हैं तो उसे वैसा लाभ मिलता है

अतएव मनुष्य को परमात्मा से अपनी भावना पवित्र करने की प्रार्थना करने की प्रार्थना करनी चाहिए!🙏

Thursday, 14 January 2021

पवित्र भाव:-

पवित्र भाव:-
 
     


            
              जिस भाव से पूजा की जाती है वैसा ही फल भी मिलता है । यदि कोई मंदिर में भगवान की मूर्ति समझकर पूजा करता है तो उसे वैसा ही लाभ होता है और साक्षात परमात्मा समझ कर पूजा करता है तो वैसा ही  लाभ मिलता है। इसी प्रकार जो गुरु से मनुष्य समझकर मिलते हैं उन्हें मनुष्य जैसा लाभ और महापुरुष समझकर मिलते हैं तो महापुरुष जैसा लाभ और आगे जब ईश्वर समझकर उसके सामने जाते हैं तो ईश्वर दर्शन का पूरा लाभ होता है ।


                                                            अतः मनुष्य को परमात्मा से अपनी भावना पवित्र करने की प्रार्थना करनी चाहिए  ।

Thursday, 31 December 2020

जब रावण मर रहा था तब श्री रामचंद्र भगवान ने लक्ष्मण जी से कहा--

जब रावण मर रहा था, तब भगवान् श्री राम ने लक्ष्मण जी से कहा --:-

           एक कथा आती है कि जब रावण मरा था, तब भगवान् श्री राम ने लक्ष्मण जी से कहा -- आज एक बड़ा विद्वान एक बड़ा नीतिज्ञ जिसने वेदों पर भाष्य आदि लिखे हैं वह जा रहा है ।

                      अतः उससे कोई लाभ लेना चाहो तो ले लो ।' लक्ष्मण जी जाकर रावण के सिर की तरफ खड़े हो गए और पूछा कि तुम्हारे जीवन का क्या सार है--यह बताओ । लक्ष्मण जी सिर की तरफ खड़े थे, इस कारण रावण बोला नहीं ।

 फिर भगवान् श्री राम के कहने से लक्ष्मण जी रावण के पैरों की तरफ जाकर खड़े हो गए तब रावण बोला--'तपस्वी, एक बात है कि जो काम करना है उसे जल्दी ही कर लेना चाहिए ।मेरा विचार था कि चंद्रमा को निष्कलंक कर दूं और चंद्रमा रोजाना पृथ्वी पर उदय हो  । अमृत लाकर समुद्र का जल मीठा कर दूं, स्वर्ग तक सीधी लगा दूं ,जिससे वहां कभी भी आ जा सके । अग्नि का धुआं मिटा दूं ऐसा बिचारा था, परंतु कर नहीं सका इस वास्ते जो काम करना हो शीघ्र  कर लेना चाहिए  ।

                                                अतः प्रत्येक अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति जो भी आपको प्राप्त है उसका सदुपयोग करोगे तो वह आपके कल्याण में सहायक हो जाएगी ।
इस बात को हमेशा सबको याद रखनी चाहिए, मेरे समझ से।

जय श्री राम, जय श्री राम, जय श्री राम ।।।

#अनमोल जीवन #वेद की जानकारी #धार्मिक और आध्यात्मिक #सच्चा ज्ञान #मनोरंजन #सच्चा ज्ञान 

Tuesday, 29 December 2020

सबसे ऊंची अवस्था, धर्म की ज्योति-

धर्म की ज्योति'' सबसे  ऊंची अवस्था -

        मनुष्य धार्मिक बने और अपने- अपने धर्म को पहचाने ।संप्रदाय भले ही अनेक हो धर्म एक ही होता है, और धर्मवान, मनुष्य सदाचारी और सिलवान बन सकता है  ।


सबसे ऊंची अवस्था-  सबसे ऊंची अवस्था यह है कि मनुष्य सुख - दु:ख, हर्ष, सुख, जय पराजय, हानि, लाभ में एक जैसा ही रहे ना खुशी के समय फुले, नाराज किस में उदासी लाए यही द्वंदातीत  अवस्था है यही मोक्ष है यही सबसे ऊंची अवस्था  है  ।

#अनमोल जीवन #सच्चा ज्ञान #मनोरंजन #धर्म #डेली सुविचार #सुखदुख 

Monday, 28 December 2020

बिन सत्संग विवेक न होई, संगत का असर--

बिनु सत्संग विवेक न होई,,, संगत का असर ---

         बिन सत्संग विवेक न होई, ""! विवेक ही बुद्धि की वह स्थिति हैजहां उसको धीरे-धीरे संसार का वास्तविक ज्ञान प्राप्त होता है और एक स्थिति ऐसी आती है जब बुद्धि थक कर बैठ जाती है और कहती है   "नेति -नेति  " । इसके बाद एक स्टेज और रह जाती है वह है  - अहंकार का नाश होना  ।


आप सब ने देखा होगा कि जब हम मंदिर जाते हैं तो वहां भगवान के चरणों में हम नारियल तोड़ते हैं नारियल के ऊपर का खोल बड़ा ही कठोर होता है और उसको तोड़ने में ताकत लगती है  । परंतु जब वह टूट जाए तो उसके अंदर मीठा फल प्राप्त होता है । सच पूछिए तो यह अहंकार तोड़ने का ही एक स्वरूप है एक उपमा है, किंतु गुरु जब यह कार्य संपन्न करता है तो साधक बिलबिला जाता है  । यह बड़ा कष्ट कर होता है । परंतु इसके बिना साधा को ईश्वर प्राप्ति का मीठा फल प्राप्त नहीं हो सकता ।
 
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