तो अब इसका उत्तर सुनिए एक होता है 'करना' और एक होता है 'होना'तो करने में तो हम सबका अधिकार है परंतु होने में अधिकार नहीं।
एक तो हम करते हैं और एक होता है। तो कर्म तो हम करते हैं और फल होता है। करने में जो कृतित्व तो अभिमान रहता है वहीं आगाड़ी फल भोग में परिणत होता है।
अतः जीव जब तक कृतित्व अभिमान पूर्वक अपने मन के अनुसार कार्य करेगा तो उसका फल उसे भोगना पड़ेगा और दुख पाना पड़ेगा ।
इस वास्ते यह सोचना है कि हम जो करते हैं ईश्वर प्रेरणा से करते हैं गलत है। हम जैसा काम करते हैं, हमें उसके अनुसार फल भोगना पड़ेगा। या भगवान का विधान है कि ऐसा करोगे तो ऐसा फल होगा।
अत:करने में सदा सावधान रहें और जो होता है,उसमें प्रसन्न रहें कि सब हमारे प्रभु के विधान के अनुसार होता है।