Wednesday, 15 April 2020

करने में सावधानी, होने में प्रसंता

इसका अर्थ हुआ कि ईश्वर संपूर्ण प्राणियों को अपनी माया से भ्रमण कराते हुए सब प्राणियों के हृदय में स्थित हैं। तो प्रश्न उठता है कि सब कुछ ईश्वर ही कराते हैं क्या ?
तो अब इसका उत्तर सुनिए एक होता है 'करना' और एक होता है 'होना'तो करने में तो हम सबका अधिकार है परंतु होने में अधिकार नहीं।
एक तो हम करते हैं और एक होता है। तो कर्म तो हम करते हैं और फल होता है। करने में जो कृतित्व तो अभिमान रहता है वहीं आगाड़ी फल भोग में परिणत होता है।
अतः जीव जब तक कृतित्व अभिमान पूर्वक अपने मन के अनुसार कार्य करेगा तो उसका फल उसे भोगना पड़ेगा और दुख पाना पड़ेगा ।
इस वास्ते यह सोचना है कि हम जो करते हैं ईश्वर प्रेरणा से करते हैं गलत है। हम जैसा काम करते हैं, हमें उसके अनुसार फल भोगना पड़ेगा। या भगवान का विधान है कि ऐसा करोगे तो ऐसा फल होगा।
                          अत:करने में सदा सावधान रहें और जो होता है,उसमें प्रसन्न रहें कि सब हमारे प्रभु के विधान के अनुसार होता है।
                          

Tuesday, 7 April 2020

शांति कैसे मिले ?

अंहता- ममता बढ़ाकर अशांति आपकी स्वयं पैदा की हुई है।
जितनी अहंता- ममता अधिक होगी, उतनी अशांति अधिक होगी। और अहंता -ममता जहां त्याग किया कि तत्काल शांति मिली।