बिनु सत्संग विवेक न होई,,, संगत का असर ---
बिन सत्संग विवेक न होई, ""! विवेक ही बुद्धि की वह स्थिति हैजहां उसको धीरे-धीरे संसार का वास्तविक ज्ञान प्राप्त होता है और एक स्थिति ऐसी आती है जब बुद्धि थक कर बैठ जाती है और कहती है "नेति -नेति " । इसके बाद एक स्टेज और रह जाती है वह है - अहंकार का नाश होना ।
आप सब ने देखा होगा कि जब हम मंदिर जाते हैं तो वहां भगवान के चरणों में हम नारियल तोड़ते हैं नारियल के ऊपर का खोल बड़ा ही कठोर होता है और उसको तोड़ने में ताकत लगती है । परंतु जब वह टूट जाए तो उसके अंदर मीठा फल प्राप्त होता है । सच पूछिए तो यह अहंकार तोड़ने का ही एक स्वरूप है एक उपमा है, किंतु गुरु जब यह कार्य संपन्न करता है तो साधक बिलबिला जाता है । यह बड़ा कष्ट कर होता है । परंतु इसके बिना साधा को ईश्वर प्राप्ति का मीठा फल प्राप्त नहीं हो सकता ।
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