Thursday, 28 May 2020

हम आंख वाले होते हुए भी कभी ईश्वर को नहीं देख पाते?

किसी अंधे मनुष्य से किसी ने पूछा, --बाबा । तुम्हें कुछ दिखाई देता है ? वह बोले नहीं बाबा दिखाएं और तो कुछ नहीं देता, दिन में दो बार ईश्वर को अवश्य देख लेता हूं। वह बोला कैसे ? कहने लगे जब कोई मुझसे पूछता है , क्या तुम भोजन करोगे ?वह भोजन देता है, ठंडा पानी पिलाता है ,सिवाय ईश्वर के मुझे यह कौन पूछेगा ?
                                                           ऐसे पूछने वाले को मैं ईश्वर ही समझता हूं , क्योंकि ईश्वर सबको देता है सबको भोजन पहुंचाता है। उस पर से मैं तो अंघा हूं, वह तो मुझे ढूंढ कर ही मेरे पास आता है। परन्तु हम आंख वाले होते हुए भी कभी ईश्वर को नहीं देख पाते।

                                                                मुकेशकुमार

Thursday, 21 May 2020

सम्मान-

प्राय  सम्मान देने की ट्रेनिंग घर से ही लेनी चाहिए। अपसंस्कृति के बढ़ते प्रभाव के चलते घर में ही सम्मान का जबरदस्त चीरहरण हो रहा है। घर परिवार के सदस्यों में बड़े -छोटे का लिहाज यदि नहीं रह गया है, तो ऐसे परिवार में कलह अशांति तनाव बना रहेगा,गोस्वामी तुलसीदास स्पष्ट करते हैं कि जहां सुमति दी होती है वहां संपत्ति होती है और जहां कुमति वहां विपत्तियां डेरा जमाए रहती है ! यहां संपत्ति से मतलब सुख शांति है और कुमति का असर अशांति तनाव तथा कलह।
तनाव भरे परिवार माहौल में रहने वाला समाज में आदर पूर्ण सम्मान नहीं प्राप्त कर सकता है,क्योंकि अंदर बाहर के भाव में सामंजस्य नहीं है तो जीवन में द्वंद बना रहेगा पहले आत्मा तो परमात्मा का आशय है ही कि व्यक्ति में यदि आत्मीयता है तो पराए लोग भी उसे हृदय से सम्मान देंगे। 
अतः अपने परिवार को परिवार समझे परिवारिक माहौल में आनंदपूर्वक जीवन व्यतीत करें एक दूसरे को सम्मान दे और सम्मान ले।
                                                                धन्यवाद
                                                              मुकेश कुमार

Saturday, 2 May 2020

ज्ञानपथ के दस आलोक

१. ईश्वर तो एक शक्ति ( पावर ) है, ना उसका कोई नाम है न         रूप। जिसने जो नाम रख लिया वही ठीक है।
२. उसको प्राप्त करने के लिए गृहस्थी त्याग कर जंगल में            भटकने की आवश्यकता नहीं , वह घर में रहने पर भी            प्राप्त हो सकता है ।
३. अभी तुमने ईश्वर देखा ही नहीं,उसे प्राप्त करने के लिए            पहले  उससे मिलो जिसने ईश्वर को  देखा है ।
४. अपने जीवन में आंतरिक प्रसन्नता लाओ। यह बहुत बड़ा 
     ईश्वरीय गुण है।
५. ज्ञान में शांति है, वह तुम्हें बाहर से नहीं मिलेगी। ज्ञान अंतर       में है। उसके लिए आंतरिक साधन करने होंगे।
६. अधिक समय तुम संसार के कामों में लगाओ, थोड़ा समय       इधर दो, लेकिन इतने समय के लिए तो संसार को भूल           जाओ।
७. दो काम साधाक के लिए बहुत ही आवश्यक है-एक तो          परिश्रम से भोजन कमाना और दूसरा अपने मन को हर           समय काम में लगाए रखना।
८. ज्ञान अनंत है। यदि एक गुरु उसे पूरा ना कर सके तो दूसरे       गुरू से प्यार करना चाहिए।
९. दुनिया के सारे काम करो लेकिन सेवक बनकर, मालिक           बन कर नहीं ।
१०. संसार में मेहमान बन कर रहो । यहां की हर वस्तु किसी          और की समझो । मैं और मेरा छोड़कर तू और तेरा का             पाठ सीखो ।